• September 18, 2022

जानिए क्या है छठ पूजा का महत्व और पौराणिक मान्यता!

जानिए क्या है छठ पूजा का महत्व और पौराणिक मान्यता!

इंटरनेट डेस्क। छठ पूजा हिन्दू धर्म में की जाने वाली सबसे कठिन पूजा है छठ पूजा होती है। छठ पूजा का ये पर्व चार दिन तक मनाया जाएगा। छठ के पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन शाम के समय सूर्य को अर्घ्य और चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है।पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा मनाई जाती है। इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कोन है छठ मैया और क्या है इस व्रत से जुडी कुछ पौराणिक मान्यताए आइए जानते है।

पौरांणिक मान्यता :- पौराणिक ग्रंथों के अनुसार,मान्यता है की छठी मैया भगवान ब्रह्माजी की मानस पुत्री और सूर्यदेव की बहन हैं। पुराणों के अनुसार, जब ब्रह्माजी सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने अपने आपको दो भागों में बांट दिया था। जिसमे ब्रह्माजी का दायां भाग पुरुष और बांया भाग प्रकृति के रूप में सामने आया। और प्रकृति सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी बनीं, जिनको प्रकृति देवी के नाम से जाना गया। प्रकृति देवी ने अपने आपको छह भागों में विभाजित कर दिया था और इस छठे अंश को मातृ देवी या देवसेना के रूप में जाना जाता है। प्रकृति के छठे अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी ( छठी मैय्या ) नाम से जाना गया।

छठ पूजा का महत्व :- , पुराणों के अनुसार माना जाता है की मनु के पुत्र राजा प्रियंवद के कोई संतान नहीं होने के कारण वह काफी परेशान रहने लगे थे। तब महर्षि कश्यप ने संतान प्राप्ति के लिए राजा प्रियंवद और उनकी पत्नी मालिनी से एक यज्ञ अनुष्ठान करने को कहा। जिसके महर्षि कश्यप की आज्ञा से राजा प्रियंवद एक यज्ञ करवाया और रानी मालिनी से यज्ञ की आहुति के लिए बनी खाने को कहा, जिसके परिणाम स्वरूप रानी मालिनी गर्भवती हो गईं। लेकिन दुर्भाग्य से उनका बच्चा गर्भ में मर गया।जिससे राजा के जीवन में फिर से मायूसी छा गयी तभी एक दिन राजा ने आसमान से उतरती हुई एक चमकते पत्थर पर विलाजित एक देवी को देखा।तो राजा ने देवी से परिचय पूछने पर देवी ने बताया की मैं ब्रह्माजी की मानस पुत्री षष्ठी हूं जो की सभी बच्चों की रक्षा भी करती हैं। मेरे ही आशीर्वाद से निसंतान स्त्रियों को संतान की प्राप्ति होती है।

तब राजा ने षष्ठी देवी की व्रत-पूजा शुरू कर दी , जिसके फलस्वरूप राजा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। राजा ने षष्ठी देवी की पूजा कार्तिक मास की षष्ठी के दिन की थी ।और पुत्र प्राप्त होने के बाद देवी षष्टी की पूजा के लिए सबको प्रेरित किया जिसके बाद से ही छठ पूजा के पर्व की परंपरा शुरू हुई और आज भी बहुत जगहों पर महिलाये अपने परिवार की सुख समृद्धि और संतान प्राप्ति के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत करती है और मान्यता के अनुसार आज भी बच्चे के जन्म के छठे दिन माँ षष्ठी की पूजा की जाती है।

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